


॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
हे परमपिता परमेश्वर दु:ख नाशक सु:ख स्वरूप परमात्मा हम आपकी शरण में हैं, आप हमें सद्बुद्धि प्रदान करें।
गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62वें सूक्त के 10वें मंत्र में इसका उल्लेख है।
सभी धर्म प्रेमी सज्जनों को सादर नमस्कार,
“सनातन धर्म रक्षा संघ” का उद्देश्य सत्य, न्याय, मानवता और शांति की स्थापना करना है। हमारा उद्देश्य धर्म की रक्षा करना है। किसी धर्म, पंथ, मजहब, जाति, सम्प्रदाय, व्यक्ति विशेष की निंदा, आलोचना करना हमारा उद्देश्य नहीं है।
हिंदुओं पर हो रहे अन्याय, अत्याचार को रोकना
संवैधानिक कानूनी तरीके से अपनी बात सरकार के समक्ष रखना
जन जागरण और हस्ताक्षर अभियान का संचालन
हनुमान चालीसा संकल्प पाठ का आयोजन

“धर्मो रक्षति रक्षितः”
रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है।

गीता के 15वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सनातन शब्द का अर्थ और गुण बतला रहे हैं।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७॥
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा अंश है और वही इस प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है।
श्लोक 8-9
वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इस मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है उसमें जाता है। यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके विषयों का सेवन करता है।
श्लोक 10
शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रोंवाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं।
“सत् ज्ञानं तनोति विस्तारयति इति सनातनः।”
जो शाश्वत है, चिरस्थायी हो और निरंतर ज्ञान का विस्तार करे, वही सनातन है।
“शाश्वतं दृढं स्थिरमेव धर्मः सनातनः।”
जो शाश्वत, दृढ, स्थिर, निरंतर और आदि एवं अंत से रहित है, वही सनातन है।
“सनातनमेनमाहुुरुताद्या स्यात् पुनर्णवम्।”
सनातन उसे कहते हैं जो आज भी नवीकृत है।
“यतोऽभ्युदयनिश्रेयससिद्धिः स धर्मः।” - गौतम ऋषि
धृति
धैर्य
क्षमा
माफ करना
दम
वासनाओं पर नियंत्रण
अस्तेय
चोरी ना करना
शौच
शुचिता
इंद्रिय निग्रह
इन्द्रियों को वश में रखना
धी
बुद्धिमत्ता
विद्या
ज्ञान की पिपासा
सत्य
सच्चाई
अक्रोध
क्रोध न करना
“जो अपने अनुकूल न हो, ऐसा व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए, यह धर्म है। परधन से अंधा, परस्त्री से नपुंसक और परनिंदा से बहरा, ये धर्म के लक्षण हैं।”
“यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥”
जो यज्ञ से बचे हुए अमृत का पान करते हैं, वे ही शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं; और जो यज्ञ नहीं करते, उनके लिए यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है, तो फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा। (गीता 4.31)
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥”
मरा हुआ धर्म मारने वाले को मार देता है और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन नहीं करना चाहिए, इस डर से कि कहीं मरा हुआ धर्म हमें न मार डाले। (महाभारत, वन पर्व)